Captain Manoj Pandey : “अगर खुद को साबित करने से पहले मुझे मौत भी आ गई तो कसम से मैं मौत को भी मात दे दूंगा” ये शब्द 24 साल के उस नौजवान के थे, जिनके भीतर देशभक्ति और हौंसले की कोई सीमा नहीं थी। शहीद कैप्टन मनोज पांडे, जिन्होंने मां भारती और गणतंत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, आज भी हर भारतीय के दिल में अमर हैं।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में समय-समय पर पाकिस्तान और चीन जैसे शत्रुओं ने हमारे गणतंत्र को चोट पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन भारतीय सेना के साहस और पराक्रम के सामने वे सभी परास्त हुए। इन वीर सेनानियों में एक नाम था – कैप्टन मनोज पांडे, जिन्होंने करगिल युद्ध में अपनी अदम्य वीरता का परिचय दिया।
मनोज पांडे का जीवन संघर्ष और साहस से भरा हुआ था। गरीबी और संसाधनों की कमी के बावजूद, उन्होंने अपने बचपन से ही बड़े लक्ष्यों को तय किया और उन्हें हासिल किया। स्कॉलरशिप प्राप्त करके अपनी पढ़ाई पूरी की और बचपन से ही भारतीय सेना में जाने का सपना पाला। उनकी लगन और प्रतिबद्धता का ही परिणाम था कि उन्होंने भारतीय सेना में प्रवेश लिया और 1/11 गोरखा राइफल्स की यूनिट में कमीशन प्राप्त किया।
कैप्टन मनोज पांडे की प्रेरणादायक कहानी
कैप्टन मनोज पांडे की सेना में भर्ती होने की कहानी भी प्रेरणादायक है। एक बार सेना के अधिकारी ने उन्हें सवाल पूछा था, “तुम भारतीय सेना में क्यों जाना चाहते हो?” और मनोज ने जवाब दिया, “मैं परमवीर चक्र प्राप्त करना चाहता हूं।” यह जवाब सुनकर अधिकारी भी हैरान रह गए थे। उनका यह लक्ष्य स्पष्ट था – देश की सेवा करना और सर्वोत्तम सम्मान प्राप्त करना।
1999 में, करगिल युद्ध के दौरान जब उनकी यूनिट को खालूबार पोस्ट से दुश्मन को खदेड़ने का आदेश मिला, तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी पीछे नहीं हटे। बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर चढ़ाई करते हुए, उनके साथ 30 जवान थे। उन्हें दुश्मन की गोलीबारी का सामना करना पड़ा, लेकिन मनोज पांडे ने अपनी वीरता और साहस से सभी को प्रेरित किया।
एक-एक करके उन्होंने दुश्मन के बंकरों को तबाह किया। उनकी बहादुरी और निशानेबाजी ने उन्हें अद्वितीय बना दिया। हालांकि, इस बीच उन्हें गंभीर रूप से घायल भी किया गया, लेकिन उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना युद्ध जारी रखा। जब वह दुश्मन के आखिरी बंकर तक पहुंचे और उसमें ग्रेनेड फेंका, तब दुश्मन की गोली उनके सिर में लग गई। लेकिन उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने साथियों से कहा, “ना छोड़ना”।
शहीद कैप्टन मनोज पांडे का बलिदान भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान, परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि यह सम्मान प्राप्त करने के लिए वह हमारे बीच नहीं थे। उनका साहस, समर्पण और देशप्रेम आज भी हर भारतीय के दिल में जीवित है।
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