Major Manoj Talwar : कहते हैं कि बचपन में ही कुछ ऐसी बातें होती हैं जो किसी व्यक्ति के जीवन को आकार देती हैं। यह बातें उसकी सोच, उसके संस्कार और उसके जीवन के उद्देश्य को प्रभावित करती हैं। कुछ ऐसे ही थे मेजर मनोज तलवार, जिनका जीवन एक प्रेरणा की मिसाल बन गया है।
बचपन से ही मेजर मनोज का रुझान सेना की ओर
मेजर मनोज तलवार का जन्म 29 अगस्त 1969 को पंजाब के जालंधर में हुआ। उनका परिवार भारतीय सेना से जुड़ा हुआ था, और उनके पिता, रिटायर्ड कैप्टन पी.एन. तलवार, सेना में अपने कर्तव्यों को बखूबी निभा चुके थे।
बचपन से ही मेजर मनोज का रुझान सेना की ओर था। उनका मन हमेशा सेना के जवानों के साथ होते हुए उन्हें सलामी देने और उनसे जुड़ी हर गतिविधि में भाग लेने के लिए प्रेरित होता था। उनका एक खास शगल था कि वह अपने पिता की सेना की कैप पहनकर दोस्तों के साथ घूमते थे, और कभी-कभी कैंट एरिया की कटीली तारों को कूदकर सेना के जवानों को हैलो बोलने जाते थे।
वर्दी से मेरी शादी हो चुकी है – मेजर मनोज तलवार
मेजर मनोज तलवार की शिक्षा में भी बहुत ही उत्कृष्टता थी, लेकिन उनका दिल हमेशा सेना के लिए धड़कता था। जब उनके माता-पिता ने उन्हें शादी के बारे में पूछा, तो उन्होंने जो जवाब दिया, उसने उनके समर्पण और देश के प्रति उनकी निष्ठा को साफ तौर पर उजागर किया।
उन्होंने कहा, “वर्दी से मेरी शादी हो चुकी है, और तिरंगे की आन, बान, और शान के लिए मैं कभी सिर पर सेहरा नहीं बाधूंगा। मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करना चाहता।” यह शब्द उनके निष्ठावान सैनिक होने की भावना को दर्शाते हैं।
1992 में उन्हें भारतीय सेना में कमीशन मिला, और उनकी पहली पोस्टिंग जम्मू और कश्मीर में हुई। इसके बाद असम में उल्फा उग्रवादियों से मुकाबला करते हुए उन्होंने अपने साहस और नेतृत्व की मिसाल पेश की। लेकिन उनका दिल कभी भी शांत नहीं रहा और उन्होंने खुद सियाचिन की कठिन पोस्टिंग पर जाने का अनुरोध किया।
करगिल युद्ध के दौरान, उनकी रेजीमेंट को 19000 फीट ऊंची तुरतुक चोटी पर कब्जा करने का टास्क मिला। मेजर मनोज तलवार और उनके सैनिक इस चुनौतीपूर्ण मिशन पर 13 जून 1999 को निकल पड़े। इस दौरान 60 डिग्री तापमान और गोलाबारी के बीच, मेजर मनोज तलवार ने तुरतुक पर तिरंगा फहराया। हालांकि, इसी मिशन के दौरान उन्होंने वीरगति को प्राप्त किया।
मेजर मनोज तलवार का अखिरी पत्र
मेजर मनोज तलवार ने अपने परिवार को 12 जून 1999 को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा था, “डियर मम्मी-पापा, हम एक टास्क पर जा रहे हैं, आप चिंता मत करें। हम जैसे पाकिस्तान को क्रिकेट में हराते हैं, वैसे ही इस युद्ध में भी पाकिस्तान को धूल चटाएंगे।” उनका यह पत्र उनके साहस और देश के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है। 16 जून 1999 को उनका पार्थिव शरीर मेरठ में उनके घर लाया गया और उसी दिन उनका वो पत्र भी उनके परिवार के पास पहुंचा।
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