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Delhi : अब भगवान बिरसा मुंडा चौक के नाम से जाना जाएगा सराय काले खां आईएसबीटी चौक

by | Nov 15, 2024 | अपना यूपी, आपका जिला, देश, मुख्य खबरें

Delhi : सराय काले खां आईएसबीटी चौक का नाम बदलकर अब भगवान बिरसा मुंडा चौक कर दिया गया है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने शुक्रवार को एक जनसभा में यह घोषणा की। यह निर्णय स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी नेता भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर लिया गया है।

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 1875 में अविभाजित बिहार के उलिहातू गांव में हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश शासन और धर्मांतरण की गतिविधियों के खिलाफ आदिवासी समुदाय को संगठित किया था। मंत्री खट्टर ने कहा कि यह चौक अब बिरसा मुंडा के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आईएसबीटी बस स्टैंड के बाहर स्थित इस चौक का नाम देखकर न केवल दिल्ली के निवासी बल्कि अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर आने वाले लोग भी उनके जीवन और आदर्शों से प्रेरणा लेंगे।

यह नामकरण स्वतंत्रता सेनानी के प्रति सम्मान व्यक्त करने और उनके योगदान को यादगार बनाने के लिए किया गया है। इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना और मनोहर लाल खट्टर के साथ मिलकर बिरसा मुंडा की प्रतिमा का अनावरण किया। बिरसा मुंडा भारतीय आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम के एक महान नायक थे।

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उन्होंने छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासियों को उनकी स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए प्रेरित किया। उनका नेतृत्व “उलगुलान” (विद्रोह) के रूप में जाने जाने वाले सशस्त्र आंदोलन का केंद्र था। भगवान बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश सरकार की जबरन भूमि हड़पने की नीतियों के खिलाफ आदिवासियों को संगठित किया। उन्होंने बंधुआ मजदूरी और गरीबी से आदिवासियों को बाहर निकालने के लिए संघर्ष किया।

अपने समुदाय को स्वाभिमान और जमीन के अधिकारों का महत्व समझाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बिरसाईत धर्म की स्थापना की, जो जीववाद और स्वदेशी मान्यताओं का मिश्रण था। यह धर्म एक ईश्वर की पूजा पर जोर देता है। बिरसा मुंडा को उनके अनुयायियों ने ‘धरती आबा’ या ‘धरती का पिता’ का उपनाम दिया। मात्र 25 वर्ष की आयु में, 9 जून 1900 को उनकी मृत्यु हो गई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। केंद्र सरकार ने 2021 में उनकी जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी, जिससे उनके योगदान और संघर्षों को राष्ट्रीय पहचान मिली है।

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