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UP Politics : सरकार, पुलिस, प्रशासन और कोर्ट जानिए कैसे सब मिलकर लगा रहे हैं राजनीति में माफियाओं पर विराम

by | Mar 19, 2024 | अन्य, अपना यूपी, आपका जिला, क्राइम, ख़बर, टॉपिक, ट्रेंडिंग, देश, बड़ी खबर, मुख्य खबरें, राजनीति, लखनऊ

UP Politics : एक समय ऐसा था कि बाहुबलियों जैसी प्रभावशाली शख्सियतों के समर्थन के बिना उत्तर प्रदेश में राजनीति में शामिल होना और सत्ता हासिल करना लगभग असंभव लगता था। हालांकि जैसे-जैसे समय बदला राजनीतिक गलियारों में भी महत्वपूर्ण बदलाव आए। कुछ पार्टियां जो कभी सरकार बनाने के लिए बाहुबलियों पर निर्भर रहती थीं (UP Politics) उन्होंने खुद को उनसे दूर करना शुरू कर दिया। इसके उलट अन्य पार्टियाँ अपने चुनावी एजेंडे के हिस्से के रूप में माफियाओं से निपटने पर ध्यान केंद्रित करके उभरीं।

पार्टियां बना रहीं बाहुबलियों से दूरी

लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ एक बार फिर ध्यान उत्तर प्रदेश की ओर आकर्षित हुआ है जहां की 80 लोकसभा सीटें दिल्ली की राह तय करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। 2019 के उलट उत्तर प्रदेश के अंदर कई समीकरण बदल गए हैं जिनमें बाहुबली फैक्टर भी शामिल है। जहां योगी सरकार अपराध और माफियाओं के प्रति शून्य-सहिष्णुता के दृष्टिकोण पर जोर देती है, वहीं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव 2012 से उसके बाद सत्ता में रहने के बावजूद, माफियाओं से अलग रहने का रुख बनाए हुए हैं। पार्टी की शुचिता की प्रतिष्ठा को बरकरार रखने की कोशिश की जा रही है, साथ ही बाहुबली परिवारों को टिकट देना जारी रखा जा रहा है।

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कुछ पर कोर्ट ने लगाई लगाम

बाहुबलियों की चर्चा करें तो जदयू से टिकट के लिए धनंजय सिंह की दावेदारी सामने आती है। शुरुआत में जौनपुर से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कृपाशंकर सिंह को बीजेपी की ओर से उम्मीदवार बनाए जाने से अटकलों पर विराम लग गया। इस झटके के बावजूद धनंजय ने सोशल मीडिया पर जौनपुर से चुनाव लड़ने का इरादा व्यक्त किया लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें अपहरण के एक मामले में सजा का सामना करना पड़ा। 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए उनकी राजनीतिक आकांक्षाएं अधूरी रह गईं हालांकि अफवाहें हैं कि उनकी पत्नी श्रीकला रेड्डी इसमें कदम रख सकती हैं।

खत्म हो रही राजनीति में माफियाओं की साख

2009 में बसपा के टिकट पर जीत और उसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में हार का सामना करने के बाद से धनंजय का राजनीतिक महत्व कम हो गया है। इसके विपरीत उनकी दूसरी पत्नी श्रीकला ने 2021 में पंचायत अध्यक्ष पद जीता। बाहुबली की राजनीति में मुख्तार अंसारी की भूमिका अहम है उनके भाई (UP Politics) अफजल समाजवादी पार्टी के टिकट पर गाजीपुर से चुनाव लड़ रहे हैं। इस क्षेत्र में पूर्व सपा नेता डीपी यादव का भी दबदबा है वे खुद या रिश्तेदारों को भाजपा के टिकट पर मैदान में उतारने पर विचार कर रहे हैं।

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बीजेपी भी कस रही बाहुबलियों पर लगाम

कैसरगंज सीट से बाहुबली ब्रज भूषण सिंह की उम्मीदवारी को लेकर चुनौतियां हैं, जिससे संभावित रूप से परिवार का हस्तक्षेप हो सकता है। प्रयागराज, पूर्व में इलाहाबाद, अतीक अहमद माफिया परिवार के राजनीतिक दांव-पेचों का गवाह रहा है। हालांकि, अतीक के निधन के बाद कानूनी उलझनों के चलते उनके परिवार के लिए चुनाव लड़ना चुनौतीपूर्ण है। बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमन मणि त्रिपाठी ने हाल ही में कांग्रेस से गठबंधन किया है और टिकट की चाह में हैं। इसी तरह, बाहुबली हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी कानूनी कार्रवाई के बीच समाजवादी पार्टी के टिकट पर श्रावस्ती या संत कबीर नगर से चुनाव लड़ना चाहते हैं।

जानकारों का ये है मानना

वरिष्ठ पत्रकार नवल किशोर सिन्हा का मानना है कि जहां एक समय बाहुबलियों ने चुनावी प्रतियोगिताओं को निर्देशित किया था, वहीं एक बदलाव तब आया जब अपराधियों ने प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी का लक्ष्य रखा। आपराधिक प्रभाव पर अंकुश लगाने के लिए पिछले सात वर्षों में सरकार की पहल से चुनावों में बाहुबली आकर्षण में कमी आई है, जो भारतीय राजनीति (UP Politics) में एक सूक्ष्म बदलाव का प्रतीक है। इस बदलते परिदृश्य में, 2024 के यूपी चुनावों में बाहुबली फैक्टर की प्रभावशीलता देखी जानी बाकी है।

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