Maharashtra News : महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ी हलचल मच गई है। जहां एक ओर मुंबई में बीएमसी चुनाव को लेकर उद्धव ठाकरे एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुणे में उनके लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी होती दिख रही है। दरअसल, पुणे नगर निगम में शिवसेना यूबीटी (उद्धव ठाकरे गुट) के पांच नगर सेवक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के संपर्क में हैं और ऐसी खबरें हैं कि ये पांच नगर सेवक जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो सकते हैं।
शिवसेना का बंटवारा और पुणे की राजनीति में बदलाव
पुणे नगर निगम में शुरुआत में 10 नगर सेवक उद्धव ठाकरे गुट के थे, लेकिन शिवसेना के बंटवारे के बाद नाना भंगिरे ने एकनाथ शिंदे का साथ दिया। इसके बाद विधानसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए येरवडा से अविनाश साल्वे कांग्रेस में शामिल हो गए। इस प्रकार, उद्धव ठाकरे गुट के पास अब सिर्फ 8 नगर सेवक रह गए हैं। लेकिन अब खबर आ रही है कि इन 8 में से 5 और नगर सेवक बीजेपी में शामिल होने की तैयारी में हैं। यह स्थिति उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है, क्योंकि इस बदलाव से उनकी पार्टी की ताकत और पुणे में उनके राजनीतिक प्रभाव पर गंभीर असर पड़ सकता है।
बीजेपी में शामिल होने की संभावना 5 जनवरी तक
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, जो पांच नगर सेवक देवेंद्र फडणवीस के संपर्क में हैं, वे 5 जनवरी तक बीजेपी जॉइन कर सकते हैं। (Maharashtra News) इस स्थिति से उद्धव ठाकरे के लिए चिंता का कारण बन सकती है, क्योंकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों और महानगर पालिका चुनावों से पहले यह एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है।
उद्धव ठाकरे के लिए नया संकट
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का प्रदर्शन काफी खराब रहा था और अब महानगर पालिका चुनाव से पहले पुणे में उन्हें एक और बड़ा झटका लग सकता है। पुणे में पार्टी के वरिष्ठ नगर सेवकों का बीजेपी में शामिल होना, उद्धव ठाकरे के लिए एक नई राजनीतिक चुनौती प्रस्तुत करता है। इससे न केवल उनकी पार्टी के समर्थन में कमी आ सकती है, बल्कि उनकी छवि भी प्रभावित हो सकती है।
क्या होगी उद्धव ठाकरे की रणनीति ?
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उद्धव ठाकरे इस नई चुनौती से कैसे निपटते हैं और क्या वे अपनी पार्टी के बचे हुए नगर सेवकों को एकजुट रख पाते हैं। पुणे जैसे महत्वपूर्ण शहर में पार्टी के प्रभावित होने से उनके लिए आगे की राजनीतिक राह और भी कठिन हो सकती है।
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