Chirag Paswan News: बिहार की सियासत इन दिनों फिर से गरम है। तेजस्वी यादव ने हाल ही में ऐलान किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो जीविका दीदियों को हर महीने 30 हजार रुपये की सैलरी दी जाएगी और संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारियों को स्थायी किया जाएगा।
लेकिन उनके इस बयान पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने चुटकी ली और कहा “पहले सरकार में तो आइए तेजस्वी जी!”
“आपस में ही लड़ रहा है ‘महागठबंधन’”- चिराग पासवान
पटना एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बात करते हुए चिराग पासवान ने कहा कि तेजस्वी यादव को पहले अपने गठबंधन के अंदरूनी झगड़े सुलझाने चाहिए।
उन्होंने कहा “महागठबंधन की पार्टियां आपस में ही भिड़ी हुई हैं। ऐसे में सत्ता में आने का सपना देखना, मुंगेरीलाल का सपना जैसा है।” चिराग ने कांग्रेस के चुनाव प्रभारी अशोक गहलोत पर भी तंज कसते हुए कहा कि उन्हें अब याद आया है कि प्रचार करना है।
“कहां हैं राहुल गांधी?“
चिराग ने सवाल किया कि राहुल गांधी इस चुनाव में नजर क्यों नहीं आ रहे? कुछ दिन पहले तो एसआईआर मुद्दे पर घूम रहे थे, लेकिन अब चुप हैं।
उन्होंने ये भी कहा “राहुल और तेजस्वी को अपने गठबंधन की पार्टियों के बीच जो गड़बड़ चल रही है, उसे सुलझाना चाहिए। जब आप अपने साथ वालों को नहीं जोड़ पा रहे, तो बिहार की 14 करोड़ जनता को कैसे साथ रखेंगे?“
‘हरियाणा में जलेबी हजम नहीं हुई, बिहार में कैसे होगी?’
राहुल गांधी के हरियाणा में जलेबी बांटने को लेकर चिराग ने फिर से तंज कसा। उन्होंने कहा “हरियाणा में कांग्रेस जलेबी बांट रही थी, लेकिन जलेबी हजम नहीं हुई, वहां जनता ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब वही हाल बिहार में भी होने वाला है।”
चिराग ने दावा किया कि 14 नवंबर के बाद स्थिति साफ हो जाएगी और महागठबंधन की हकीकत सबके सामने आ जाएगी।
‘खुद चुनाव लड़ने से डर रहे हैं प्रशांत किशोर’
प्रशांत किशोर के चुनाव न लड़ने के फैसले पर भी चिराग पासवान ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा “अगर नेता खुद चुनाव लड़ने से डरता है, तो फिर उसके संगठन के कार्यकर्ता क्यों मेहनत करेंगे? जब लीडर ही मैदान में नहीं उतरना चाहता, तो जनता उसका क्या भरोसा करेगी?”
क्या मतलब निकलता है इन बयानों का?
इस पूरे बयानबाज़ी से साफ है कि जैसे-जैसे बिहार में चुनाव नजदीक आ रहे हैं, नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
- तेजस्वी यादव वादा कर रहे हैं – रोजगार, वेतन और स्थायीत्व का।
- वहीं चिराग पासवान और एनडीए के नेता विपक्ष की कमजोरियों और अंदरूनी कलह को मुद्दा बना रहे हैं।
अब देखना ये होगा कि जनता किसकी बात पर भरोसा करती है – वादों पर या अनुभव पर? 14 नवंबर को इसका जवाब मिल जाएगा।
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