पूरी दुनिया के लिए ग्लोबल वार्मिंग एक खतरा बन गया है। पूरी पृथ्वी पर जिसका प्रभाव पड़ रहा है। मौसम का मिजाज में उल्लेखनीय परिवर्तन एवं ग्लेशियर तीब्र गति से पिघल रहे है। ऐसा ही एक उदाहरण ग्रीनलैंड, डेनमार्क की स्थिति है, जहां सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, बर्फीले समुद्र तट तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं।
जलवायु वैज्ञानिक लौरा लारोचे के अनुसार, 2019 में अपनी डेनमार्क यात्रा के दौरान जब उन्होंने लगभग 15 साल पहले की हजारों संग्रहीत हवाई छवियों की तुलना वर्तमान से की, तो एक रहस्योद्घाटन सामने आया। छवियों ने क्षेत्र में गर्म और ठंडे मौसम के बीच बर्फीली नदियों के परिवर्तन को प्रदर्शित किया।
ग्रीनलैंड में ग्लेशियर पीछे हटने की गति चिंताजनक है। इस सप्ताह नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि 20वीं सदी की तुलना में 21वीं सदी में ग्लेशियर दोगुनी तेजी से पीछे हटने लगे है।
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वैज्ञानिक ग्लेशियरों में बदलावों से आश्चर्यचकित हैं, वही लौरा लारोचे का कहना है कि यह काम समय लेने वाला लेकिन आवश्यक था। वह कहती हैं, “यह वास्तव में जिस गति से आर्कटिक गर्म हो रहा है और बदल रहा है। उस तीव्र गति को उजागर कर रहा है।”
2022 में किए गए एक अलग अध्ययन में यह पाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक पिछले कुछ दशकों में दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में चार गुना तेजी से गर्म हुआ है। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि, 2021 में पहली बार गर्मियों के दौरान ग्रीनलैंड की चोटियों पर समुद्र तल से लगभग दो मील ऊपर वर्षा हुई थी।
बता दें कि केवल ग्रीनलैंड तक ही चिंताजनक प्रवृत्ति ही सीमित नहीं है। अब तो यह ग्लेशियर भारत में भी तीब्र गति से पिघल रहे हैं। जिसमे अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख एवं उत्तराखंड शामिल है। इन विभिन्न जिलों, क्षेत्रों में बढ़ते तापमान का चिंताजनक प्रभाव नजर आ रहा है।
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इसके अलावा हिमालय के ग्लेशियर भी तेज़ी से पिघल रहे हैं। इस साल जून में इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले दस साल की तुलना में हिमालय के ग्लेशियर 65 फीसदी ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। बता दें कि साल 2100 तक 75 से 80% ग्लेशियर पिघल सकते है। जिसकी वजह से क्षेत्र में लाखों लोगों के लिए पानी की आपूर्ति पर असर पड़ेगा।
अफगानिस्तान से बांग्लादेश तक फैले हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र में स्थिति गंभीर है। इस 3,500 किलोमीटर के विस्तार में ग्लेशियर लगभग 240 मिलियन लोगों को पानी की आपूर्ति करने वाली नदियों का स्रोत हैं। आईसीआईएमओडी के मुताबिक, इन ग्लेशियरों का एक बड़ा हिस्सा तेजी से पिघल रहा है।
तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के परिणामों से संयुक्त राज्य अमेरिका भी अछूता नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अलास्का का बेरी आर्म ग्लेशियर पीछे हो रहा है साथ ही बता दें कि समुद्र में इस ग्लेशियर के गिरने से सुनामी आ सकती है।


